चिड़िया - दो कविताएँ

चिड़िया -1

हवाएँ दूर वन से
नहीं आ रही हैं
न तो कोई भूकम्प हुआ है, भारी
इधर केवल
एक चिड़िया
डगाल से उड़ी है।
........

चिड़िया-2

चिड़िया
डगाल पर
एक अर्से से चुप बैठी है।

न आजू हवा है
न बाजू पानी
उसके पास एक मँजी-मँजाई
भाषा है।

चहचहाना अब उसका जुर्म
हो गया है
उसकी चहचहाहट
अब लोगों ने चुरा ली
तो वे उसमें
अब एक नयी भाषा की तलाश
कर रहे हैं।

मैंने परसों
एक चिड़िया देखी
जो घोंसले से निकलकर
पैदल चली आ रही थी
और लोग सब
अपने-अपने घोंसलों में
चिड़िया हो गए थे

मैं चिड़ियों का झुण्ड नहीं हो सका।
सोचता रहा
डगाल पर
चिड़िया चुप क्यों बैठी है ?
आजू हवा क्यों नहीं है ?
बाजू पानी क्यों नहीं है ?

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