मैंने घुसते ही जाना
कि वह है गेटवे ऑफ इण्डिया।
मैं उत्साहित होने ही वाला था
कि कर दिया गया
कबूतरों की उड़ान से
चौकन्ना।
नहीं बनना चाहता था कवि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नहीं बनना चाहता था कवि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
त्रिमूर्ति
एलीफेण्टा गुफाओं की त्रिमूर्ति से
मिलाता रहा
अपना चेहरा
कहीं कुछ फर्क नहीं दिखा।
मैंने सेल्यूट की तरह ही
दाग दी हँसी।
मेरी हँसी बाजू खड़े जोड़े ने
चुरा ली,
मैं मूर्ति हो गया।
मिलाता रहा
अपना चेहरा
कहीं कुछ फर्क नहीं दिखा।
मैंने सेल्यूट की तरह ही
दाग दी हँसी।
मेरी हँसी बाजू खड़े जोड़े ने
चुरा ली,
मैं मूर्ति हो गया।
दूध गंध
नदियाँ अपने बिस्तरों पर पड़ी रहीं
मैंने जगाया नहीं उन्हें।
उन की आँखों में
मैंने नहीं देखा
दूध-घी
केवल खोलता हुआ लहू था
दूध गंध
फिर किधर से आई ?
मैंने जगाया नहीं उन्हें।
उन की आँखों में
मैंने नहीं देखा
दूध-घी
केवल खोलता हुआ लहू था
दूध गंध
फिर किधर से आई ?
चुनाव
मैंने हारकर
चुन लिया है एक सूखा वृक्ष
जिसकी जड़ें गई है धरती के छोरों तक
निकलेंगे ही एक दिन हरे पत्ते।
चुन लिया है एक सूखा वृक्ष
जिसकी जड़ें गई है धरती के छोरों तक
निकलेंगे ही एक दिन हरे पत्ते।
चिड़िया - दो कविताएँ
चिड़िया -1
हवाएँ दूर वन से
नहीं आ रही हैं
न तो कोई भूकम्प हुआ है, भारी
इधर केवल
एक चिड़िया
डगाल से उड़ी है।
........
चिड़िया-2
चिड़िया
डगाल पर
एक अर्से से चुप बैठी है।
न आजू हवा है
न बाजू पानी
उसके पास एक मँजी-मँजाई
भाषा है।
चहचहाना अब उसका जुर्म
हो गया है
उसकी चहचहाहट
अब लोगों ने चुरा ली
तो वे उसमें
अब एक नयी भाषा की तलाश
कर रहे हैं।
मैंने परसों
एक चिड़िया देखी
जो घोंसले से निकलकर
पैदल चली आ रही थी
और लोग सब
अपने-अपने घोंसलों में
चिड़िया हो गए थे
मैं चिड़ियों का झुण्ड नहीं हो सका।
सोचता रहा
डगाल पर
चिड़िया चुप क्यों बैठी है ?
आजू हवा क्यों नहीं है ?
बाजू पानी क्यों नहीं है ?
हवाएँ दूर वन से
नहीं आ रही हैं
न तो कोई भूकम्प हुआ है, भारी
इधर केवल
एक चिड़िया
डगाल से उड़ी है।
........
चिड़िया-2
चिड़िया
डगाल पर
एक अर्से से चुप बैठी है।
न आजू हवा है
न बाजू पानी
उसके पास एक मँजी-मँजाई
भाषा है।
चहचहाना अब उसका जुर्म
हो गया है
उसकी चहचहाहट
अब लोगों ने चुरा ली
तो वे उसमें
अब एक नयी भाषा की तलाश
कर रहे हैं।
मैंने परसों
एक चिड़िया देखी
जो घोंसले से निकलकर
पैदल चली आ रही थी
और लोग सब
अपने-अपने घोंसलों में
चिड़िया हो गए थे
मैं चिड़ियों का झुण्ड नहीं हो सका।
सोचता रहा
डगाल पर
चिड़िया चुप क्यों बैठी है ?
आजू हवा क्यों नहीं है ?
बाजू पानी क्यों नहीं है ?
पेड़
एक पेड़ है
हवा है
बारिश के पहले-
जो घोंसले हैं
हिल रहे हैं।
हिलता हुआ दिन है
हिलती हुई रात है।
उजाले कम्पास में भरकर दौड़ते हुए
अँधेरे से हाथ रँगे हैं
खामोशी की तरह ही
टूटे हैं कमीज़ के बटन।
जैसे, पूरा समय घड़ी से कूदकर
डगाल पर अटक गया हो
और डगाल कंगाल हो।
सब कुछ दिखता रहा
जैसे पहाड़ की तरह चिड़ियाँ
गिनती की तरह भविष्य।
हम अपनी उँगलियां गिनते हुए
पेड़ के नीचे खड़े रहे।
हवा है
बारिश के पहले-
जो घोंसले हैं
हिल रहे हैं।
हिलता हुआ दिन है
हिलती हुई रात है।
उजाले कम्पास में भरकर दौड़ते हुए
अँधेरे से हाथ रँगे हैं
खामोशी की तरह ही
टूटे हैं कमीज़ के बटन।
जैसे, पूरा समय घड़ी से कूदकर
डगाल पर अटक गया हो
और डगाल कंगाल हो।
सब कुछ दिखता रहा
जैसे पहाड़ की तरह चिड़ियाँ
गिनती की तरह भविष्य।
हम अपनी उँगलियां गिनते हुए
पेड़ के नीचे खड़े रहे।
गहराई
सन्नाटे में गुँथा हुआ है
एक कुआँ मन
कोई एक पत्थर शोर का मारता है
बुलबुले की जगह
बाहर आता है वही परिचित चेहरा।
किनारे होंठो से बँधी हुई
एक सूखी झील है।
सन्नाटे में सना हुआ है चेहरा
पहचान के लिए लोग अपने साथ
चेहरा भर उत्साह लाये हैं।
कहीं कुछ कहने के पहले
अपने-अपने कुएँ की गहराई नापें।
गुलदस्ता
उतरा हुआ चेहरा नहीं चाहिये
उसे सन्दूक में रख सकते हैं
चेहरा संदूक है
(सन्दूकइन होने से बचें)
क्या मुश्किल है कि
सभी के पास चेहरे हैं
चेहरे में चारों धाम हैं
आँख
कान
नाक
मुँह
मेरे घर से
अजायबघर बहुत नकदीक है
जबकि अपना चेहरा
मैंने बहुत सम्हाल कर रखा है।
क्या वह सोना है
किले का फाटक बड़ा है
मेरे चेहरे का फाटक
किले के फाटक का समानुपाती नहीं है।
एक बड़ा बाग है
बाग में फूल हैं
चिड़ियों की चहचहाहट है
क्या बाग में फूलों का गुलदस्ता / या
चिड़ियों की चहचहाहट का खजाना
बनाया जा सकता है
लो! मैंने अपना चेहरा
गुलदस्ता या खजाना होने से
बचा लिया है
इस काम में
मुझे किसी की सहायता (लेने) की
जरूरत नहीं पड़ी।
उसे सन्दूक में रख सकते हैं
चेहरा संदूक है
(सन्दूकइन होने से बचें)
क्या मुश्किल है कि
सभी के पास चेहरे हैं
चेहरे में चारों धाम हैं
आँख
कान
नाक
मुँह
मेरे घर से
अजायबघर बहुत नकदीक है
जबकि अपना चेहरा
मैंने बहुत सम्हाल कर रखा है।
क्या वह सोना है
किले का फाटक बड़ा है
मेरे चेहरे का फाटक
किले के फाटक का समानुपाती नहीं है।
एक बड़ा बाग है
बाग में फूल हैं
चिड़ियों की चहचहाहट है
क्या बाग में फूलों का गुलदस्ता / या
चिड़ियों की चहचहाहट का खजाना
बनाया जा सकता है
लो! मैंने अपना चेहरा
गुलदस्ता या खजाना होने से
बचा लिया है
इस काम में
मुझे किसी की सहायता (लेने) की
जरूरत नहीं पड़ी।
भूकम्प-बोध
मेरी नींद
हवाई जहाज की दूसरी उड़ान से खुल गई़
जैसे खुल जाते हैं
आँखें के कपाट
दृश्यों की आवाज से।
गड़गड़ाता हुआ दृश्य
घिर्री भीतर खींचता है
मैं पानी खींचकर
आँखें धो लेना चाहता हूँ
पर कुआँ नहीं है
न पानी नल में-
नींद की गर्दन मरोड़कर
आँखों में रख दी है।
आँखों में पूरा घर
बाढ़ में तैरता हुआ
लकड़ी के गट्ठे-सा लगा
जिसमें से रह-रह कर
कभी मेरी पत्नी तो कभी बच्चे
झाँकते रहे पलक बनकर।
अपनी पलकों और पैरों को सम्हालते हुए
जैसे पलकों में घर और
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पेरियार होस्टल के
तीसरी मंजिल के किसी कमरे में
इन्तजार कर रहा हूँ
सोंधी सुबह की
कि अचानक धऱती का फैन बेल्ट टूटा !
या पाताल-लोक का पानी हिला !
या धरती हँसी !
यो रोयी !
या सुस्तायी !
(जैसे वह काम कर रही हो)
खुले केश वाली वह लम्बी काली लड़की
लड़कों की टोली में,
सिगरेट पीती हुई मैदान पर थी-लगातार
भूकम्प और सरकार पर
बत्तीसी निकालती हुई।
लड़कों को इस वक्त सोए रहना था
मेरे पीछे वाले लड़के ने टोका
इस 9-के सुबह सिरीज में
यह पहला मौका नहीं हैं, जबकि
लड़के जाग रहे हैं
लड़कियाँ जाग रही हैं।
केवल तीसरी मंजिल से
गड़बड़ी देखते हुए
मैं उसे ग्राफ से अंकित कर रहा हूँ
मुझे ग्राफ में
मेरा अपना घर धँसा हुआ दिखता है-
घँसे हुए घर के दरवाजे पर
बना स्वस्तिक अब त्रिशूल हो गया है
जबकि पूरी जमीन हिल-डुल गई है
सोती हुई लड़की की तरह ।
(जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पेरियार होस्टल की तीसरी मंजिल पर भूकम्प बोध)
हवाई जहाज की दूसरी उड़ान से खुल गई़
जैसे खुल जाते हैं
आँखें के कपाट
दृश्यों की आवाज से।
गड़गड़ाता हुआ दृश्य
घिर्री भीतर खींचता है
मैं पानी खींचकर
आँखें धो लेना चाहता हूँ
पर कुआँ नहीं है
न पानी नल में-
नींद की गर्दन मरोड़कर
आँखों में रख दी है।
आँखों में पूरा घर
बाढ़ में तैरता हुआ
लकड़ी के गट्ठे-सा लगा
जिसमें से रह-रह कर
कभी मेरी पत्नी तो कभी बच्चे
झाँकते रहे पलक बनकर।
अपनी पलकों और पैरों को सम्हालते हुए
जैसे पलकों में घर और
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पेरियार होस्टल के
तीसरी मंजिल के किसी कमरे में
इन्तजार कर रहा हूँ
सोंधी सुबह की
कि अचानक धऱती का फैन बेल्ट टूटा !
या पाताल-लोक का पानी हिला !
या धरती हँसी !
यो रोयी !
या सुस्तायी !
(जैसे वह काम कर रही हो)
खुले केश वाली वह लम्बी काली लड़की
लड़कों की टोली में,
सिगरेट पीती हुई मैदान पर थी-लगातार
भूकम्प और सरकार पर
बत्तीसी निकालती हुई।
लड़कों को इस वक्त सोए रहना था
मेरे पीछे वाले लड़के ने टोका
इस 9-के सुबह सिरीज में
यह पहला मौका नहीं हैं, जबकि
लड़के जाग रहे हैं
लड़कियाँ जाग रही हैं।
केवल तीसरी मंजिल से
गड़बड़ी देखते हुए
मैं उसे ग्राफ से अंकित कर रहा हूँ
मुझे ग्राफ में
मेरा अपना घर धँसा हुआ दिखता है-
घँसे हुए घर के दरवाजे पर
बना स्वस्तिक अब त्रिशूल हो गया है
जबकि पूरी जमीन हिल-डुल गई है
सोती हुई लड़की की तरह ।
(जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पेरियार होस्टल की तीसरी मंजिल पर भूकम्प बोध)
माइक्रोफोन
ये जो माइक्रोफोन है न
गूँगा है।
ये मुझसे
मेरी आवाज
उधार माँगता है।
माइक्रोफोन,
क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि आज सिर्फ तू ही बोले
और मैं चुप रहूँ ?
गूँगा है।
ये मुझसे
मेरी आवाज
उधार माँगता है।
माइक्रोफोन,
क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि आज सिर्फ तू ही बोले
और मैं चुप रहूँ ?
बचपन
बचपन से कितनी दूर आ गया हूँ
कि अब लौटा नहीं जा सकता।
घुटनों के बल
चलते हुए बेटे को देखकर
फिर याद आया
बचपन।
माँ कहती है
मेरा बचपन
मेरे बेटे की तरह
जहाँ हमेशा सुबह ही सुबह होते।
तो क्या यह मेरा बचपन है
मेरे सामने
राजा-रानियों से जूझता मेरा बचपन
भूकम्प लाता मेरा बचपन
किताबें पढ़ता-फाड़ता मेरा बचपन
बचपन के कितना नजदीक आ गया हूं मैं
कि अब लौटा नहीं जा सकता
मूझे लगता है,
कि बचपन अब मेर घुटने में कैद है।
कि अब लौटा नहीं जा सकता।
घुटनों के बल
चलते हुए बेटे को देखकर
फिर याद आया
बचपन।
माँ कहती है
मेरा बचपन
मेरे बेटे की तरह
जहाँ हमेशा सुबह ही सुबह होते।
तो क्या यह मेरा बचपन है
मेरे सामने
राजा-रानियों से जूझता मेरा बचपन
भूकम्प लाता मेरा बचपन
किताबें पढ़ता-फाड़ता मेरा बचपन
बचपन के कितना नजदीक आ गया हूं मैं
कि अब लौटा नहीं जा सकता
मूझे लगता है,
कि बचपन अब मेर घुटने में कैद है।
फूल और हम
तितलियों के आने से
छूट गये फूलों के पसीने-
पर वे परास्त नहीं हुए।
परास्त हुए जा रहे
और हम अपने ही पसीने से
परास्त पसीने
कुछ नहीं कर सकते-
शोर भी नहीं।
छूट गये फूलों के पसीने-
पर वे परास्त नहीं हुए।
परास्त हुए जा रहे
और हम अपने ही पसीने से
परास्त पसीने
कुछ नहीं कर सकते-
शोर भी नहीं।
स्मृतियाँ
वह अपनी सड़ी स्मृतियों के भीतर
धीरे से पहुँचा
और वहाँ से निकाल लाया जूता।
जूते में पूरी की पूरी पृथ्वी थी
और जूते के ऊपर पैर
वह उन पैरों के सहारे
खड़ा होता रहा।
वह कहता है- “यह कैसी पृथ्वी है-
जहां जूते ही जूते
नजर आ रहे हैं।”
उसने सभी लोगों से कहा-
कि अपने-अपने जूते उतार लें
फिर उसने
पृथ्वी को चमड़े से ढंक देने की
इच्छा से
अपना जूता भी उतार दिया।
तब से उसने
अब तक जूते नहीं पहिने।
धीरे से पहुँचा
और वहाँ से निकाल लाया जूता।
जूते में पूरी की पूरी पृथ्वी थी
और जूते के ऊपर पैर
वह उन पैरों के सहारे
खड़ा होता रहा।
वह कहता है- “यह कैसी पृथ्वी है-
जहां जूते ही जूते
नजर आ रहे हैं।”
उसने सभी लोगों से कहा-
कि अपने-अपने जूते उतार लें
फिर उसने
पृथ्वी को चमड़े से ढंक देने की
इच्छा से
अपना जूता भी उतार दिया।
तब से उसने
अब तक जूते नहीं पहिने।
ज्वालामुखी
तुममे से जब-जब आग झरे
उन्हें सँभाले कर रखना
(पर उसे कहाँ रखोगे
यह एक समस्या है)
उन्हें जहाँ भी रखोगे
वहाँ आग लग जाएगी।
उसे झरने से रोको
पचा डालो
भीतर ही भीतर।
वे जब भी निकलेंगे
ज्वालामुखी होंगे ।
उन्हें सँभाले कर रखना
(पर उसे कहाँ रखोगे
यह एक समस्या है)
उन्हें जहाँ भी रखोगे
वहाँ आग लग जाएगी।
उसे झरने से रोको
पचा डालो
भीतर ही भीतर।
वे जब भी निकलेंगे
ज्वालामुखी होंगे ।
गांधी
मुझे सभी पाना चाहते हैं
पहले
तुम्हारी माचिस में
जितनी भी कड़ियाँ हैं
उन्हें फेंक दो-
मैं तुम्हें जरूर मिलूँगा।
पहले
तुम्हारी माचिस में
जितनी भी कड़ियाँ हैं
उन्हें फेंक दो-
मैं तुम्हें जरूर मिलूँगा।
मछली की इच्छा
गोबर बीनकर घर लौटती हुई
लड़कियाँ का उत्साह या गरमाहट
क्या सूरज सोख लेता है
आज सूरज
पहले से ज्यादा रक्ताभ है।
लड़कियों के चेहरे
अब नदी नहीं हैं-
मछलियों का कुछ अता-पता नहीं
मछलियां अब नदी छोड़कर
लड़कियों के टोकरों में
छिप गयी हैं-
मछुआरों से बच जाने के लिए।
मछलियाँ खुश हैं कि
वे अब चुपचाप चूल्हों पर पक जायेंगी
लड़कियों को फिर से
रक्ताभ बनाने के लिए।
लड़कियाँ का उत्साह या गरमाहट
क्या सूरज सोख लेता है
आज सूरज
पहले से ज्यादा रक्ताभ है।
लड़कियों के चेहरे
अब नदी नहीं हैं-
मछलियों का कुछ अता-पता नहीं
मछलियां अब नदी छोड़कर
लड़कियों के टोकरों में
छिप गयी हैं-
मछुआरों से बच जाने के लिए।
मछलियाँ खुश हैं कि
वे अब चुपचाप चूल्हों पर पक जायेंगी
लड़कियों को फिर से
रक्ताभ बनाने के लिए।
शीर्षकहीन
औरतों को देखकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता
कि वे भोली हैं, उदार या क्रूर
औरतें औरतें ही हैं
इस पृथ्वी पर ललकती हुई।
एक समय में एक औरत पूरी जलवायु होती है
सम्पूर्ण शरीर के साथ।
औरत जैसे आग में तपा हुआ एक गोला
सूरज तो कहीं नहीं ठहरता
पानी भरते नक्षत्र और तारे
जैसे दमकल ले आग बुझाने चले हों।
लगातार नक्शे से गाँव टूटते चले जा रहे हैं
फिर, फिर नींव रखती जा रही है औरत
बेहद चौकन्नी हुई औरत
एक बार फिर सँभलती है, सँवरती है
अपने को आइने में देखती है
हर सुबह
और सोचती है कि
कल फिर वह औरत ही होगी।
यहाँ ही नहीं है औरतें
औरतें त्रिभुवन में भी हैं
शंख बजाती हुई औरतें
पौधों में पानी डालती हुई औरतें
गोबर बीनती हुई औरतें
गोली दागती हुई औरतें
खाना परोसती हुई औरतें
हँसती-इठलाती हुई औरतें
दुःख-दर्द बाँटती हुई औरतें
इमली खाती हुई औरतें।
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